भुगतान का हिसाब RTI में मांगा गया, तो क्या जवाब मिला—रिकॉर्ड हैं, पर साझा नहीं?
कैशबुक–वाउचर पर ‘अस्पष्टता’ की ढाल, जबकि राज्य सूचना आयोग पहले ही दे चुका है साफ फैसला

कोरबा। सूचना का अधिकार अधिनियम जनता को सरकारी खर्च का हिसाब देखने का अधिकार देता है, लेकिन वन विभाग के कुछ दफ्तरों में यह अधिकार अब भी “शब्दों की बारीकी” में उलझा दिया जाता है। RTI के तहत वर्ष 2023–24 और 2024–25 के दौरान किए गए भुगतानों की कैशबुक और वाउचर मांगे गए, मगर जवाब में जानकारी नहीं—कानूनी व्याख्या दे दी गई।
वन परिक्षेत्र जटगा कार्यालय ने अपने लिखित उत्तर में कहा कि आवेदन में मांगी गई जानकारी “मद के अनुसार स्पष्ट नहीं है”, इसलिए भुगतान से संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराना संभव नहीं है। यानी सवाल खर्च का था, जवाब नियमों का।
जब यही तर्क पहले खारिज हो चुका है
यही “अस्पष्टता” वाला तर्क पहले भी दिया जा चुका है। राज्य सूचना आयोग, छत्तीसगढ़ ने साफ कहा था कि यदि कोई आवेदक एक निश्चित अवधि के सभी भुगतानों से संबंधित कैशबुक और वाउचर की जानकारी मांगता है, तो उसे अस्पष्ट नहीं माना जा सकता ।
आयोग ने यह भी स्पष्ट किया था कि सूचना अधिकारी का दायित्व है कि वह आवेदक से संवाद कर आवेदन स्पष्ट करवाए, न कि केवल “स्पष्ट नहीं है” लिखकर आवेदन को खारिज कर दे।
आयोग के इस फैसले के बावजूद आज भी वही पुरानी प्रक्रिया दोहराई जा रही है—
जब भुगतान का हिसाब मांगा जाए, तो पहले सवाल पर सवाल खड़े कर दिए जाएं।
RTI कार्यकर्ताओं का कहना है कि सार्वजनिक धन से जुड़े भुगतानों की जानकारी देना पारदर्शिता की बुनियाद है, लेकिन नियमों की आड़ में जानकारी टालना RTI की मूल भावना पर सवाल खड़े करता है।
देखना यह है कि अपीलीय स्तर पर विभाग को जानकारी देने के निर्देश मिलते हैं या फिर “अस्पष्टता” का यह खेल आगे भी जारी रहता है।




